गुरुवार, 30 अगस्त 2018

About Buddha

        🌷गौतम बुध्दांचा संक्षिप्त जीवनपट 🌷
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1) पंणजोबाचे नाव          :  राजा जयसेन
2) पणजीचे नाव             :  राणी जयंती
3) आजोबाचे नाव           :  राजा सिंहहनू
4) आजीचे नाव               :  राणी कच्चायना
5) वडिलांचे नाव             :  राजा शुध्दोधन
6) आईचे नाव                 :  राणी महामाया
7) मावशी ( सावत्र आई)  :  महाप्रजापती गौतमी
8) आत्या                       :  अमिता, प्रमिता
9) आत्या भाऊ               :  देवदत्त
10) सावत्र भाऊ              :  नंद, रूपनंद
11) चुलते                       : धौतोधन, शुक्लोधन, अभितोधन
12) गौतमांचे जन्मस्थळ    :  लुंबिनी  ( नेपाळ )
13) गौतमांचे जन्मवर्ष       : इ.स.पुर्व 563 (आषाढ पौर्णिमा)
14) वंश                           : शाक्य
15) पत्निचे नाव                :  यशोधरा ( गोपा )
16) यशोधराशी लग्न          :  ई.स.पूर्व  574
17) शाक्य संघाचे सभासद  :  वयाच्या 26 व्या वर्षी
18) मुलाचे नाव                 :  राहूल
19) गौतमांचा गृहत्याग       :  29 व्या वर्षी
20) सम्यक सम्बुध्द            :  ई.स.पूर्व  528
21) महापरिनिर्वाण            :  ई.स.पूर्व  483
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About Sudha Bharatdwaj

आखिर कौन है सुधा भारद्वाज  जिसे सरकार ने   
                    गिरफ्तार कर लिया ?
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सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनने वाली सुधा भारद्वाज के बारे में अगर आप नहीं जानते तो पहली मुलाकात में आप उन्हें कोई घरेलू महिला मान लेने की भूल कर सकते हैं.

यह सादगी उनके घर से दफ़्तर तक हर कहीं पसरी हुई नज़र आती है. लेकिन इस सादगी से परेशान लोगों की फ़ेहरिस्त लंबी है.

अभी कुछ ही महीने पहले की बात है.

छत्तीसगढ़ में एक बहुराष्ट्रीय सीमेंट कंपनी के प्रबंधक ने बातों ही बातों में धीरे से कहा- "नाम मत लीजिए सुधा भारद्वाज का. उनके कारण हमारे यहां काम करने वाले मज़दूर हमारे सिर पर चढ़ गए हैं."

बस्तर में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम को पुलिस के आला अधिकारी ने चेतावनी दी, "अगर आप सुधा भारद्वाज को जानते हैं तो तय मानिए कि आप हमारे नहीं हो सकते."

लेकिन ऐसी राय रखने वालों से अलग छत्तीसगढ़ में कोंटा से रामानुजगंज तक ऐसे हज़ारों लोग मिल जाएँगे जिनके लिए वो सुधा दीदी हैं. शिक्षिका सुधा दीदी, वकील सुधा दीदी, सीमेंट मज़दूरों वाली सुधा दीदी, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा वाली सुधा दीदी.

अर्थशास्त्री रंगनाथ भारद्वाज और कृष्णा भारद्वाज की बेटी सुधा का जन्म अमरीका में 1961 में हुआ था.

1971 में सुधा अपनी मां के साथ भारत लौट आईं. जेएनयू में अर्थशास्त्र विभाग की संस्थापक कृष्णा भारद्वाज चाहती थीं कि बेटी वह सब करे, जो वह करना चाहती है.

सुधा कहती हैं, "वयस्क होते ही मैंने अपनी अमरीकन नागरिकता छोड़ दी. पांच साल तक आईआईटी कानपुर से पढ़ाई के दौरान ही दिल्ली में अपने साथियों के साथ झुग्गी और मज़दूर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना और छात्र राजनीति में मज़दूरों के सवाल की पड़ताल की कोशिश शुरू की."

शायद यही कारण है कि आईआईटी टॉपर होने के बाद भी किसी नौकरी के बजाय 1984-85 में वे छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के मज़दूर आंदोलन से जुड़ गईं.

कुछ दिनों तक छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहा लेकिन जल्दी ही बोरिया-बिस्तर समेटकर वे स्थायी रुप से छत्तीसगढ़ आ गईं.

दल्ली राजहरा के शहीद अस्पताल में एक मरीज़ को लेकर पहुंचे कोमल देवांगन बताते हैं, "सुधा और उनके साथियों ने मज़दूरो के बच्चों को पढ़ाने से लेकर उनके कपड़े सिलने तक का काम किया. नियोगी जी ने संघर्ष और निर्माण का जो नारा दिया था, सुधा भारद्वाज जैसे लोग उसे धरातल पर लाने वालों में से हैं."

जुझारू मज़दूर नेता शंकर गुहा नियोगी की 1991 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.

छत्तीसगढ़ में मज़दूरों के हक़ की लड़ाई में सुधा भारद्वाज उतरीं तो फिर पलट कर नहीं देखा.

शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को जब एक राजनीतिक दल की शक़्ल दी गई, तब सुधा भारद्वाज उसकी सचिव थीं.

लेकिन उसके बाद सुधा भारद्वाज अलग-अलग किसान और मज़दूर संगठनों में काम करते हुए भी पद संभालने से बचती रहीं.

वे आज भी अपने को एक सामान्य सामाजिक कार्यकर्ता ही मानती हैं.

छत्तीसगढ़ में सामाजिक संगठनों के समूह 'छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन' के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "सुधा दीदी, हमारे जैसे लोगों की प्रेरणास्रोत हैं. वे चुपचाप अपना काम करती चली जाती हैं."

भिलाई में मज़दूरों की लड़ाई हो या एसीसी, लाफार्ज़-होलसिम कंपनी के विदेशी प्रबंधकों से लड़ाई और वार्ता का दौर; सुधा भारद्वाज का कहना है कि अधिकांश अवसरों पर सत्ता प्रतिष्ठान की पहली कोशिश हर तरह के आंदोलन को कुचलने की ही होती है. इसके लिए सारे उपक्रम अपनाये जाते हैं.

पूरे छत्तीसगढ़ में मज़दूर आंदोलन के दौरान सबसे बड़ा खर्चा मुक़दमों पर होता था. मज़दूरों के लिए मुक़दमों की तैयारी में पैसा भी जाता था और मेहनत भी.
40 की उम्र में अपने मज़दूर साथियों की सलाह पर वक़ालत की पढ़ाई कर डिग्री ली और फिर आदिवासियों, मज़दूरों का मुक़दमा ख़ुद ही लड़ना शुरु किया.

मज़दूरों से जुड़े मामलों में फ़ैसले भी पक्ष में आने लगे क्योंकि मज़दूर संगठनों के भीतर काम करने के कारण उसके सारे दाँव पेंच जाने-समझे हुए थे. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ऐसे कई मुक़दमे लड़े गए.

कुछ सालों बाद 'जनहित' नाम से वकीलों का एक ट्रस्ट बनाया और तय किया कि समाज के वंचित अलग-अलग समूहों के मुक़दमे मुफ़्त में लड़ेंगे.

बिलासपुर के अपने कार्यालय में फ़ाइलों के बीच उलझी सुधा भारद्वाज का अनुमान है कि उनके ट्रस्ट ने पिछले कुछ सालों में कोई 300 से अधिक मुक़दमे लड़े हैं, ज़िला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक. मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई की महासचिव होने के नाते मानवाधिकार हनन के अलग-अलग मोर्चे पर सुधा भारद्वाज ने कई लड़ाइयां लड़ी.

बस्तर के फ़र्जी मुठभेड़ों की पड़ताल और फिर उसके मुक़दमों ने राज्य सरकार को कई अवसरों पर मुश्किल में डाला.

अवैध कोल ब्लॉक, पंचायत क़ानून का उल्लंघन, वनाधिकार क़ानून, औद्योगिकरण के मसले पर भी सुधा भारद्वाज की ज़मीनी लड़ाई की अपनी पहचान है.
अपनी पूरी संपत्ति मज़दूर आंदोलन में लगा देने वाली सुधा भारद्वाज के पास संपत्ति के नाम पर दिल्ली में मां के हिस्से का एक मकान है, जिसका किराया मज़दूर यूनियन को जाता है.

सुधा भारद्वाज कहती हैं, "संगठन में आर्थिक तंगी तो बनी रही लेकिन हमने बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था की, अपना मज़दूरों का अस्पताल खोला."

मज़दूरों के मुक़दमें लड़ने वाली 'जनहित' भी समान विचारधारा वाले साथियों के चंदे से चलती है. मुक़दमों की ख़्याति ऐसी कि मुंबई हाईकोर्ट ने भी हाल ही में छह लाख रुपये 'जनहित' को दिए.

सुधा भारद्वाज कहती हैं, "पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मैं ख़ुश होती हूं कि मैंने मज़दूरों और आदिवासियों की लड़ाई में थोड़ा-सा साथ दिया. ऐसे लोग, जिनके जीवन में तमाम दुखों के बाद भी मनुष्य होने को बनाए और बचाए रखना पहली प्राथमिकता थी. मैं फिर से ऐसे ही जन्म लेना चाहूंगी, इन्हीं के बीच."

साभार - आलोक प्रकाश पुतुल , बीबीसी
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सोमवार, 27 अगस्त 2018

Dr. Ambedkars Economic Thoughts

डॉ. बाबासाहेब आंबेेडकरांचे अर्थशास्त्र विषयक विचार
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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर हे अर्थशास्त्रज्ञ म्हणून ओळखले जातात. त्यांचा मुख्य विषय अर्थशास्त्र होता. या विषयावर त्यांनी विपुल लेखन केले आहे. आदर्श चलन पद्धती, कृषी उद्योग, खासगी सावकार प्रतिबंधक विधेयक, जातीचे अर्थशास्त्र, आर्थिक पायाभरणी इत्यादी विषयावर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांनी विचार मांडले आहेत. भारताची केंद्रिय बँक - भारतीय रिझर्व बँकेच्या स्थापनेत बाबासाहेबांचे मोठे योगदान आहे.
भारताच्या कीर्तिवंत सुपुत्रांमध्ये डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचे नाव अग्रस्थानी आहे. भारत देशाच्या इतिहासातील पहिले सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्रज्ञ हे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर होत. देशाच्या सामाजिक-राजकीय क्षितिजावर त्यांचा उदय इ.स. १९२० च्या दशकात झाला. समाजाच्या, अस्पृश्य म्हणून हिणविल्या गेलेल्या अगदी तळातील वर्गाच्या पुनरुत्थानासाठी सामाजिक, राजकीय, आर्थिक आणि धार्मिक पातळीवर तेव्हापासूनच त्यांचा संघर्ष सुरू होता. बाबासाहेब एक थोर विचारवंत होते आणि त्यांनी अर्थशास्त्रज्ञ, समाजशास्त्रज्ञ, विधिज्ञ, शिक्षणतज्ज्ञ, पत्रकार, संसद सदस्य आणि या सर्वांच्या पलीकडे जाऊन समाजसुधारक आणि मानवाधिकारांचा रक्षक या नात्याने केलेले कार्य अतुलनीय आहे. देशभरातील अस्पृश्य समाजाला एकवटून, संघटित करून सामाजिक समतेच्या ध्येयाप्रत जाण्याच्या दृष्टीने राजकीय मार्ग कसा अवलंबायचा, याविषयी त्यांनी दिशादर्शन केले.
अस्पृश्य समाजात मध्ये जन्मलेल्या बाबासाहेबांनी देश-विदेशातल्या तीन खंडांतून उच्च शिक्षण प्राप्त केले. कोलंबिया विद्यापीठाची अर्थशास्त्रातील पीएच. डी. (१९१७),  लंडन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्समधून डॉक्टर ऑफ सायन्सची पदवी तसेच लंडनमधील ग्रेज इन्ची बार अ‍ॅट लॉ (१९२३) अशा अतिउच्च पदव्या त्यांनी संपादित केल्या. दलित समाजातील विद्यार्थ्याने त्या काळात अशा प्रतिष्ठेच्या पदव्या मिळविणे ही अद्वितीय बाब होती.
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांचा मूळ अभ्यासविषय अर्थशास्त्र हाच होता. बाबासाहेबांनी अर्थशास्त्रात विपुल लिखाण केले असून, या विषयावर त्यांची तीन प्रमुख पुस्तके आहेत. : १) अ‍ॅडमिनिस्ट्रेशन ॲन्ड फायनान्स ऑफ दि ईस्ट इंडिया कंपनी, २) दि इव्होल्यूशन ऑफ प्रोव्हिन्शियल फायनान्स इन ब्रिटिश इंडिया आणि ३) दि प्रॉब्लेम ऑफ द रुपी : इट्स ओरिजिन ॲन्ड इट्स सोल्यूशन. 
पहिली दोन पुस्तके सार्वजनिक वित्तव्यवस्थेवरील असून, त्यातील पहिल्या पुस्तकात ईस्ट इंडिया कंपनीच्या इ स. १७९२ ते इ.स. १८५८ या काळातील वित्तव्यवहारावर भाष्य केले आहे. दुसरे पुस्तक ब्रिटिशांच्या आमदनीतील भारतात वित्तीय व्यवहारांमधील केंद्र आणि राज्य संबंधांवर भाष्य करते. हा कालखंड इ.स. १८३३ ते इ.स. १९२१ असा आहे. त्यांचे तिसरे पुस्तक चलनविषयक अर्थशास्त्रावरील एक उत्कृष्ट ग्रंथ मानला गेला आहे. या पुस्तकात इ.स. १८००पासून इ.स. १८९३ पर्यंतच्या कालखंडात विनिमयाचे माध्यम म्हणून भारतीय चलनाची कशी उत्क्रांती झाली, हे बाबासाहेबांनी सांगितले आहे. तसेच १९२० च्या दशकाच्या पूर्वार्धात सुयोग्य चलनाची निवड करण्यात आलेल्या अडथळ्यांचीही चर्चा त्यांनी केली आहे. भारतात परतल्यावर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी अर्थशास्त्रावर एकही पुस्तक लिहिले नाही. मात्र, त्यांच्या कार्याचा आढावा घेतल्यास त्यांच्यातील अर्थतज्ज्ञ वारंवार डोकावत राहतो.
बॉम्बे लेजिस्लेटिव्ह असेम्ब्लीचे सदस्य असताना (१९२६) ग्रामीण भागातील गरिबांच्या समस्यांविषयीचे त्यांचे समग्र आकलन त्यांनी उभारलेल्या जनआंदोलनांमध्ये प्रतिबिंबित होते. शेतीमधील खोती पद्धतीविरुद्ध त्यांनी केलेल्या यशस्वी आंदोलनामुळे अनेक ग्रामीण गरिबांची आर्थिक शोषणातून मुक्तता झाली. महार वतन या नावाखाली सुरू असलेल्या शुद्ध गुलामगिरीविरुद्ध त्यांनी आवाज उठविल्यानंतर ग्रामीण भागातील गरिबांचा मोठा वर्ग शोषणमुक्‍त झाला. सावकारांच्या मनमानीला चाप लावण्यासाठी त्यांनी असेम्ब्लीमध्ये विधेयक आणले. औद्योगिक कामगारांच्या क्षेत्रात डॉ. आंबेडकरांनी इ.स.१९३६ मध्ये स्वतंत्र मजूर पक्षाची स्थापना केली. त्याकाळी कामगारांचा आवाज बुलंद करणार्‍या अन्य संघटना होत्याच; मात्र त्यांना अस्पृश्य कामगारांच्या मानवाधिकारांशी काहीही देणे-घेणे नव्हते. नव्या राजकीय पक्षाने ही उणीव भरून काढली. त्याचप्रमाणे व्हॉइसरॉयज् एक्झिक्युटिव्ह कौन्सिलचे कामगार सदस्य या नात्याने १९४२ ते १९४६ या काळात डॉ. आंबेडकर यांनी कामगारविषयक धोरणात आमूलाग्र सुधारणा घडवून आणल्या. त्यात सेवायोजन कार्यालयाची स्थापना ही महत्त्वपूर्ण घटना होती आणि स्वतंत्र भारतातील औद्योगिक संबंधांची तीच पायाभरणी ठरली. बाबासाहेबांनी पाटबंधारे, ऊर्जा आणि इतर सार्वजनिक बांधकामे ही खातीही सांभाळली. देशाचे पाटबंधारे धोरण निश्‍चित करण्यात त्यांनी महत्त्वाची भूमिका बजावली. दामोदर व्हॅली प्रकल्पाचा यात प्राधान्याने समावेश करावा लागेल.
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बुधवार, 22 अगस्त 2018

भिमा तुझ्या मताचे...

*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते,*
*तर काँग्रेस राष्ट्रवादी,*
*भाजप सेना मनसेत,*
*कुणी गेलेच नसते.*

*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते ,*
*एकत्र सगळे राहिले असते,*
*स्वतःचे नाही,*
*समाजाचे हित पाहिले असते.*

*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते,*
*मंत्री पदासाठी लाचार ते झालेच नसते,*
*एकाच वाटेने सगळेजण गेले असते,*
*शोधले नसते त्यांनी*
*वेगवेगळे रस्ते.*

*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते ,*
*भारत देशाचे चित्र बदलले असते ,*
*गरीब येथे कुणीच नसते,*
*आन्याय,अत्याचार झालेच नसते ,*
*येथे समतेचे राज्य असते,*
*आनंदाने जन हसले असते ,*
*चेहऱ्यावर समाधान दिसले असते .*

*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते,*
*भैय्यासाहेब भोतमांगे*
*मुळीच खचले नसते,*
*नितीन आगे सारखे*
*अनेक तरुण वाचले असते ,*
*मोहन भागवत घटना* *बदलण्याची भाषा बोललेच नसते.*
*भिमा तुझ्या मताचे*
*जर पाच लोक असते .*

        

घोटाले



1987 - बोफोर्स तोप घोटाला, 960 करोड़
1992 - शेयर घोटाला, 5,000 करोड़।।
1994 - चीनी घोटाला, 650 करोड़
1995 - प्रेफ्रेंशल अलॉटमेंट घोटाला, 5,000 करोड़
1995 - कस्टम टैक्स घोटाला, 43 करोड़
1995 - कॉबलर घोटाला, 1,000 करोड़
1995 - दीनार / हवाला घोटाला, 400 करोड़
1995 - मेघालय वन घोटाला, 300 करोड़
1996 - उर्वरक आयत घोटाला, 1,300 करोड़
1996 - चारा घोटाला, 950 करोड़
1996 - यूरिया घोटाला, 133 करोड
1997 - बिहार भूमि घोटाला, 400 करोड़
1997 - म्यूच्यूअल फण्ड घोटाला, 1,200 करोड़
1997 - सुखराम टेलिकॉम घोटाला, 1,500 करोड़
1997 - SNC पॉवेर प्रोजेक्ट घोटाला, 374 करोड़
1998 - उदय गोयल कृषि उपज घोटाला, 210 करोड़
1998 - टीक पौध घोटाला, 8,000 करोड़
2001 - डालमिया शेयर घोटाला, 595 करोड़
2001 - UTI घोटाला, 32 करोड़
2001 - केतन पारिख प्रतिभूति घोटाला, 1,000 करोड़
2002 - संजय अग्रवाल गृह निवेश घोटाला, 600 करोड़
2002 - कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज घोटाला, 120 करोड़
2003 - स्टाम्प घोटाला, 20,000 करोड़
2005 - आई पि ओ कॉरिडोर घोटाला, 1,000 करोड़
2005 - बिहार बाढ़ आपदा घोटाला, 17 करोड़
2005 - सौरपियन पनडुब्बी घोटाला, 18,978 करोड़
2006 - पंजाब सिटी सेंटर घोटाला, 1,500 करोड़
2008 - काला धन, 2,10,000 करोड
2008 - सत्यम घोटाला, 8,000 करोड
2008 - सैन्य राशन घोटाला, 5,000 करोड़
2008 - स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र, 95 करोड़
2008 - हसन् अली हवाला घोटाला, 39,120 करोड़
2009 - उड़ीसा खदान घोटाला, 7,000 करोड़
2009 - चावल निर्यात घोटाला, 2,500 करोड़
2009 - झारखण्ड खदान घोटाला, 4,000 करोड़
2009 - झारखण्ड मेडिकल उपकरण घोटाला, 130 करोड़
2010 - आदर्श घर घोटाला, 900 करोड़
2010 - खाद्यान घोटाला, 35,000 करोड़
2010 - बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला, 2,00,000 करोड़
2011 - 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, 1,76,000 करोड़
2011 - कॉमन वेल्थ घोटाला, 70,000 करोड़

भारत पर राज

1=1193 मुहम्मद ग़ौरी
2=1206 क़ुतुबुद्दीन ऐबक
3=1210 आराम शाह
4=1211 इल्तुमिश
5=1236 रुकनुद्दीन फ़िरोज़ शाह
6=1236 रज़िया सुल्ताना
7=1240 मुईज़ुद्दीन बहराम शाह
8=1242 अल्लाउदीन मसूद शाह
9=1246 नासिरुद्दीन महमूद
10=1266 ग़यासुदीन बल्बन
11=1286 कै ख़ुसरो
12=1287 मुइज़ुद्दिन कैकुबाद
13=1290 शमसुद्दीन कैमुर्स
1290 ग़ुलाम वंश समाप्त्
(शासन काल-97 वर्ष लगभग )
● खिलजी वंश
1=1290 जलालुदद्दीन फ़िरोज़ ख़िलजी
2=1296 अल्लाउदीन ख़िलजी
3=1316 शहाबुद्दीन उमर शाह
4=1316 कुतुबुद्दीन मुबारक शाह
5=1320 नासिरुदीन ख़ुसरो शाह
6=1320 ख़िलजी वंश स्माप्त
(शासन काल-30 वर्ष लगभग )
● तुगलक वंश
1=1320 ग़यासुद्दीन तुग़लक प्रथम
2=1325 मुहम्मद बिन तुग़लक द्वितीय
3=1351 फ़िरोज़ शाह तुग़लक
4=1388 ग़यासुद्दीन तुग़लक द्वितीय
5=1389 अबु बकर शाह
6=1389 मुहम्मद तुग़लक तृतीय
7=1394 सिकंदर शाह प्रथम
8=1394 नासिरुदीन शाह सानी
9=1395 नुसरत शाह
10=1399 नासिरुदीन महमूद शाह सानी (दुबारा सता पर)
11=1413 दोलतशाह
1414 तुग़लक वंश समाप्त
(शासन काल-94 वर्ष लगभग )
● सैय्यद वंश
1=1414 ख़िज्र ख़ान
2=1421 मुइज़ुद्दिन मुबारक शाह सानी
3=1434 मुहमद शाह चतुर्थ
4=1445 अल्लाउदीन आलम शाह
1451 सईद वंश समाप्त
(शासन काल-37वर्ष लगभग )
● लोदी वंश
1=1451 बहलोल लोदी
2=1489 सिकंदर लोदी दूसरा
3=1517 इब्राहिम लोदी
1526 लोदी वंश समाप्त
(शासन काल-75 वर्ष लगभग )
● मुग़ल वंश
1=1526 ज़हीरुदीन बाबर
2=1530 हुमायुँ
1539 मुग़ल वंश मध्यांतर
● सूरी वंश
1=1539 शेर शाह सूरी
2=1545 इस्लाम शाह सूरी
3=1552 महमूद शाह सूरी
4=1553 इब्राहिम सूरी
5=1554 फ़िरोज़ शाह सूरी
6=1554 मुबारक ख़ान सूरी
7=1555 सिकंदर सूरी
सूरी वंश समाप्त, (शासन काल-16 वर्ष लगभग )
● मुग़ल वंश पुनः प्रारंभ
1=1555 हुमायुँ (दुबारा गद्दी पर)
2=1556 जलालुदीन मुहम्मद अकबर
3=1605 जहाँगीर सलीम
4=1628 शाहजहाँ
5=1659 औरंगज़ेब
6=1707 शाह आलम प्रथम
7=1712 जहाँदार शाह
8=1713 फ़ारूख़सियर
9=1719 रईफुद्दरजात
10=1719 रईफुद्दौला
11=1719 नेकुशीयार
12=1719 महमूद शाह
13=1748 अहमद शाह
14=1754 आलमगीर
15=1759 शाह आलम
16=1806 अकबर शाह
17=1837 बहादुर शाह ज़फ़र
1857 मुग़ल वंश समाप्त
(शासन काल-315 वर्ष लगभग )
● ब्रिटिश राज (वाइसरॉय)
1=1858 लॉर्ड केनिंग
2=1862 लॉर्ड जेम्स ब्रूस एल्गिन
3=1864 लॉर्ड जहॉन लोरेन्श
4=1869 लॉर्ड रिचार्ड मेयो
5=1872 लॉर्ड नोर्थबुक
6=1876 लॉर्ड एडवर्ड लुटेन
7=1880 लॉर्ड ज्योर्ज रिपन
8=1884 लॉर्ड डफरिन
9=1888 लॉर्ड हन्नी लैंसडोन
10=1894 लॉर्ड विक्टर ब्रूस एल्गिन
11=1899 लॉर्ड ज्योर्ज कर्झन
12=1905 लॉर्ड गिल्बर्ट मिन्टो
13=1910 लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंज
14=1916 लॉर्ड फ्रेडरिक सेल्मसफोर्ड
15=1921 लॉर्ड रुक्स आईजेक रिडींग
16=1926 लॉर्ड एडवर्ड इरविन
17=1931 लॉर्ड फ्रिमेन वेलिंग्दन
18=1936 लॉर्ड एलेक्जंद लिन्लिथगो
19=1943 लॉर्ड आर्किबाल्ड वेवेल
20=1947 लॉर्ड माउन्टबेटन
ब्रिटिश राज समाप्त
आजाद भारत, प्राइम मिनिस्टर
1=1947 जवाहरलाल नेहरू
2=1964 गुलजारीलाल नंदा
3=1964 लालबहादुर शास्त्री
4=1966 गुलजारीलाल नंदा
5=1966 इन्दिरा गांधी
6=1977 मोरारजी देसाई
7=1979 चरणसिंह
8=1980 इन्दिरा गांधी
9=1984 राजीव गांधी
10=1989 विश्वनाथ प्रतापसिंह
11=1990 चंद्रशेखर
12=1991 पी.वी.नरसिंह राव
13=अटल बिहारी वाजपेयी
14=1996 ऐच.डी.देवगौड़ा
15=1997 आई.के.गुजराल
16=1998 अटल बिहारी वाजपेयी
17=2004 डॉ.मनमोहनसिंह
18=2014 से नरेन्द्र मोदी
764 सालों तक मुसलमानों का भारत पर राज रहा l कोई भी धर्म या जाती कभी खतरे में नहीं आई
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शनिवार, 18 अगस्त 2018

मूलनिवासी वीर

शहीदों के नाम जानते है जिन्होंने अंग्रेजो के छक्के छुड़ा दिए थे, नही ना तो इस सूची को जरूर पढ़ें क्योंकि विदेशी आर्य हमारे मूलनिवासी वीरो को इतिहास से भुलाना चाहते है।*
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1- *तिलका मांझी*
2- *वीरा पासी*
3- *उदा देवी पासी*
4- *महाबीरी देवी वाल्मीकि*
5- *सिद्धु संथाल*
6- *गोची मांझी*
7- *उदइया चमार*
8- *चेतराम जाटव*
9- *बब्लू मेहतर*
10- *बांके चमार*
11- *वीर बुद्धु भगत*
12- *झलकारी बाई*
13- *उधम सिंह*
14- *सम्पति चमार (चौरा-चौरी कांड में फांसी)*
15- *अयोध्या प्रसाद पासी (चौरा-चौरी कांड में फांसी)*
16- *कल्लू चमार*
17- *श्री फलई (चौरा-चौरी कांड में 8 साल की कैद)*
18- *गरीब दास*
19- *नोहर दास*
20- *बिरजा*
21- *मेराई [चौरा-चौरी कांड] में आजीवन कारावास की सजा हुयी!*
22- *मेंकुलाल [1932 में मोतीबाग कांड] के दौरान शहीद हुए!*
23- *शिवदान [1942 में भारत छोड़ा] आंदोलन में शहीद हुए!*
24- *रमापति चमार। चौरा चौरी कांड के नायक।*
25- *बांके चमार [जिला जौनपुर- 1857] में अंग्रेजों के बीच इनकी इतनी दशहत थी कि तब इन पर अंग्रेजों ने 50 हजार रुपये का इनाम रखा था। तब 2 पैसे में बैल मिल जाते थे।*
26- *उदैया चमार [अलीगढ़ क्षेत्र] - इन्होंने सौ से ज्यादा अंग्रेजों को अकेले मार गिराया था।*
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छत्रपती संभाजी राजे.

               छत्रपती संभाजी राजे.
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वजन - 220 किलो
ऊंची - 7 फुट 8 इंच
जेवण - 35-40 भाकरया दिवसातून
दोनदा
तलवारीचे वजन - 65 किलो
पराक्रम - 203 युद्ध लढले एकही न हरता
सर्वात मोठे युद्ध- समोर शत्रूचे 5 लाख
सैन्य
उभे व आपले सैन्यबळ फ़क्त 37 हजार असून
सुद्धा स्वराज्याला विजय प्राप्त करून
देणारा एकमेव शुर.
एकाच युद्धात जवळ जवळ 2 लाख शत्रुंना
एकटाच मृत्युमुखी पाडणारा जगातील
एकमेव
योद्धा.
अरे आपल्याला साधा 15 किलो चा
सिलिंडर
उचलवत नाही तर विचार करा आपल्या
वजनाइतक्या जड़ तलवारि उचलून कसे काय
युद्ध जमत असेल या मावळ्यांना.. गर्व बाळगा
की असे शूरवीर आपल्या महाराष्ट्राच्या
मातीत जन्माला आले.

"छत्रपती संभाजी महाराज बलिदान स्मरण दिन."

शंभुराजांना पकडून जेव्हा औरंगजेबासमोर आणलं, तेव्हा तो औरंगजेब "सिवाच्या पोराला" पाहायला सिंहासन सोडून खाली उतरला. अत्याचाराने माराने घायाळ झालेले शरीर, पण....
मान ताठच, नजर हि तशीच....

त्या नजरेकडे पाहत औरंगजेब विचार करू लागला....

तो हाच का संभा?? ज्याने ह्या आलमगीराला नऊ वर्षे रानोमाळ हिंडवल....
एखादा मेंढपाळ आपल्या मेंढ्या घेऊन फिरतो तद्वतच ह्याने मला फिरवलं.....

माझे नामांकित सरदार ज्यांच्या शौर्यावर मी अनेक लढाया जिंकल्या, त्यांनाच ह्याने आस्मान दाखवलं??

माझी कैक लाखांची सेना... लांबून एखाद्याने पहिली तर छातीत धडकीच भरावी एवढं अफाट अफाट मनुष्यबळ.... पण ह्या संभाजीने पार वाट लावली त्यांची,

तो हाच का संभाजी?? वाटलं होत संभा म्हणजे शिवाजीच्या पोटाला आलेला तख्तनशील वारीस, संभाजी म्हणजे व्यसनी, दुराचारी, संभाजी म्हणजे बदफैली, संभाजी म्हणजे नादान बच्चा सिवाचा, पण..... पण नाही, माझा अंदाज साफ चुकला,

ह्या नादान पोरानं बुढाप्यामध्ये मला जवान बनवलं, त्या सिवापेक्षा दहापट अधिक तापदायक आहे हा संभाजी.....

अरे त्या सीवाने माझे किल्ले किल्ले जिंकले, प्रदेश जिंकला पण कधी बुऱ्हाणपूरला हात नाही घातला, पण हा संभाजी गादीवर आला आणि सगळ्यात आधी ह्याने बुऱ्हाणपूर लुटलं, भागानगर जाळून टाकलं, कैक कोटींचा खजिना ह्याने ओढून आपल्या वळचणीला टांगला...

साढे आठ वर्षांचा असताना हा आला होता सिवाबरोबर आग्र्यात, त्यावेळी मी त्याला विचारलं होत... "क्यों रे संभा, तुम्हे डर नही लगता हमारा??" तेव्हा हा म्हणाला होता, "हमें किसीका डर नही लगता, पर हमारी वजाहसे सबको डर लगता है."
हाच तो संभाजी....

पुरे हिंदुस्थान के आलमगीर होना चाहते है हम... पण माझ्या ह्या महत्वाकांक्षेलाच यानं छेद दिला, बुढाप्यामध्ये जवान बनवला ह्या पोराने मला, ह्याची माणसं हि तशीच बेडर, धाडसी, पराक्रमी,

तो तो तो नाशिकचा किल्ला "रामशेज".... किल्याच्या खाली माझी ३०-४० हजारांची फौज आणि किल्ल्यावर ह्याची अवघी ६०० माणसं, पण सहा वर्षे अजिंक्य ठेवला किल्ला त्यांनी, माणसाच्या हृदयात काय पेरतो हा कुणास ठाऊक??

मी इंग्रजांना ह्यांच्याविरुद्ध चिथावलं, पुर्तुगीझांना ह्यांच्याविरद्ध उभं केलं, सिद्धी ला ह्याच्या विरुद्ध लढायला प्रवृत्त केलं, पण सगळ्यांच्या उरावर पाय देऊन हा उभा राहिला, इंग्रजांना चारी मुंड्या चित केलं, पुर्तुगीझांची हाडे खिळखिळी केली, जंजिऱ्याच्या सिद्धीचा तर कंबरडंच मोडलं ह्याने, माझं कैक लाखाचं सैन्य, माझे नातलग, माझे शाहजादे ह्या सगळ्यांवर जबरदस्त जरब बसवली ह्याने, माझ्या सैन्याने तर आपण कुठे मरणार हे पण गृहीत धरलं होत.

मद्रास, पाषाणकोट, तंजावर, जंजिरा, प्रत्येक जागी हा आणि ह्याची माणसे आहेतच, जळी स्थळी काष्टी पाषाणी जणू हाच दिसत होता मला, कसल्या मिट्टीचा बनलाय हा??

औरंगजेब आसन सोडून उठला आणि त्या खुदाचे आभार मानायला जमिनीवरून गुडघे टेकून बसला..... "अय खुदा, आखीर तुने वो दिन दिखाया..... शुक्रगुजार है हम तेरे"

त्याच वेळी शंभूराजे कविराज कलशांना विचारते झाले, "काय कविराज ह्या अशा वेळी सुचतीय का एखादी कविता?"

आणि तत्क्षणी कविराज बोलते झाले.... "राजन तुम हो सांझे, खूब लढे हो जंग, देख तुम्हारा प्रताप महि, तखत त्यजत औरंग"

याचा अर्थ असा : राजन काय लढलात आपण... काय तुमचं ते शौर्य.... तुमचा प्रताप पाहून हा औरंगजेब स्वतःच सिंहासन सोडून तुमच्या समोर गुढघे टेकून बसलाय.....

आणि मग सुरु झालं अत्याचारांचा पाशवी खेळ, ४२ दिवस सतत, सलग,
क्षणाक्षणाला, भीमा-इंद्रायणी सुद्धा आसवं गळू लागल्या....

ह्या अत्याचारांच्या शृंखलेत एक दिवस असाही आला जेव्हा "मियाखान" ज्याच्या दोन्ही मुलींची लग्ने स्वतः संभाजीराजांनी स्वतःच्या बहिणी समजून लावून दिली होती, तो आला... पाहिलं त्याने "मराठ्यांच्या राजाची झालेली दुरावस्था", डोळे काढलेत, कान कापलेत, हातापायाची बोटे छाटलीत, रक्त....फक्त रक्त ठिबकतंय त्यातून... चामडी सोलून काढलीय पूर्णांगाची.... त्यावर बसणारे किडे, माश्या पहिल्या, त्यांचा होणार त्रास बोलून दाखवायला वाचाच राहिली नव्हती.... जीभ छाटली होती माझ्या राजाची....

तो मियाखान अशाही परिस्थितीत विचारता झाला शंभू राजांना, "राजं वाचवू का तुम्हाला?? घेऊन जातो तुमच्या स्वराज्यात..." आवाज ओळखीचा वाटला तशी शरीराची तगमग, तडफड सुरु झाली, हातपाय हलायला लागले, उठून बसायचा एक केविलवाणा प्रयत्न आणि तो हि सपशेल फसला.... सततचे अत्त्याचार सोसून जर्जर झालेला देह साथ देईनासा झाला.... आणि त्यांची अशी अवस्था पाहून पुन्हा मियाखान बोलला.. " नको राजं.... नकोच..... तुम्हाला हा असा स्वराज्यात घेऊन गेलो तर तिथली रयत माझ्यावर छी थू करेल, मलाच मृत्यूच्या दाढेत लोटून देईल... विचारेल मला ज्याने तुझ्या मुलींची लग्ने स्वतःच्या बहिणी समजून लावून दिली त्या... त्या आमच्या राजाची अशी अवस्था झाल्यावर त्याला आमच्याकडे घेऊन येताना तुला लाज नाही वाटली का?? नाहीत सहन होणार मला त्यांच्या आरोपांच्या फैरी.... त्यापेक्षा तुम्ही इथ मेलेलंच बरं...."

हे शब्द ऐकताच थरारला-शहारला छावा, साखळदंडांनी जखडलेल्या देहाला हिसके बसायला सुरुवात झाली.... त्यांच्या आवाजांनी त्या भयाण रात्रीची शांतता भंग पावली, चोरट्या पावलांनी शंभुराजांना भेटायला, पाहायला आलेला मियाखान मृत्यूच्या कराल दाढेत अडकल्यासारखा जागच्या जागीच थिजून थरथरायला लागला... मशाल विझली.... आणि त्यातून ऐकू येऊ लागला साखळदंडांचा संथ आवाज... काही वेळानंतर तो आवाजही थांबला..... संभ्याला काय झालं हे पाहायला आलेल्या एका पहारेकरी हशमाला तो रक्तात लोळागोळा होऊन पडलेला शंभूंचा देह हातातल्या मशालीच्या उजेडात दिसला.... तो पाहिल्यावर एक विषारी फुत्कार टाकून तिथे असलेली एक मशाल पेटवून तो हशम शंभूराजांपासून निघून गेला...

अंधारात लपून बसलेला मियाखान काही वेळानी बाहेर पडला.... मघाचा साखळदंडांचा आवाज त्याला राजापर्यंत यायला भाग पाडत होता.... तो आला... आला... जवळ आला... समोरच्या मशालीच्या उजेडात मघाची झालेली हालचाल कशासाठी होती हे शोधू लागला आणि तिथल्याच एका दगडी शिळेवर बोटं तुटल्या हाताने शंभूराजांनी लिहिलेले शब्द वाचून पुरता शहारला... ती वाक्ये होती "वाचवाच मला खांसाहेब, माझ्या नुसत्या जिवंत असण्यानेसुद्धा हा औरंगजेब बादशहा खंगून खंगून मारून जाईल.... वाचवाच मला खांसाहेब"

मरणाच्या दाढेत पडलेला असूनसुद्धा... अरे मृत्यू देहावर, विचारांवर थैमान घालत असताना सुद्धा फक्त आणि फक्त स्वराज्यासाठी जगायची, रयतेसाठी लढायची, अशाही परिस्थितीत असलेली दुर्दम्य इच्छाशक्ती पाहून पुरता भारावून गेला... एखाद्या लहान बाळासारखा मुसमुसून रडायला लागला.... अल्लाहकडे हात पसरून बोलायला लागला, "इन्सानियत का सच्चा वारीस आज तेरे करीब आ रहा है, उसपे अपनी रेहमात बरसा, तेरे जन्नत के दरवाजे इस पाकदिल इन्सान के लिये हमेशा खुले रख"....

अरे दुष्मनाच्या काळजात घर करून राहिलेला... दुश्मन ज्याच्या अफाट ताकदीचा चाहता झाला... त्या.... त्या महाराष्ट्राच्या दुसऱ्या छत्रपतीला, दस्तुरखुद्द छात्रपती शिवरायांच्या छाव्याला आमच्या स्वकीयांनीच रेखाटताना
खूप वेगळा रेखाटला....

आम्हाला संभाजी सांगितला ना...

पण तो सांगितला असा...

संभाजी म्हणजे व्यसनी, बदफैली, रगेल आणि रंगेल, आणि तेवढाच संभाजी आम्ही लक्षात ठेवून त्याच बलिदान मात्र सोयीस्कररीत्या विसरून गेलो..

९ वर्षे... सलग ९ वर्षे... इंग्रज, पोर्तुगीझ, सिद्धी, मोघल अशा एक नाही तब्बल बारा बारा आघाड्यांवर स्वराज्यासाठी दुश्मनांची ससेहोलपट करणारा संभाजी आम्हाला कुणी सांगितलाच नाही...

वयाच्या १४ व्या वर्षी संस्कृत पंडित ठरलेला, सातसतक, नखशिखा, बुधभुषणंकार झालेला नृपशंभो आम्हाला कुणीच नाही दाखवला,

दुष्काळाने पीडित रयतेला शेतसारा माफ करून सरकारातून पैसे आणि बी-बियाणं पुरवून शेतीला आणि शेतकऱ्याला आधार देणारा जाणता राजा नाही सांगितला...

तब्बल १४० लढाया करून एकही लढाईत पराभूत न झालेला रणमर्द सर्जा संभाजी आम्हाला कळूच दिला नाही कुणी...

स्वतःच्या बायकोला "स्त्री सखी राज्ञी जयती" असा 'किताब देऊन तत्कालीन पुरुषप्रधान संस्कृतीला उघड आव्हान देत स्त्री पुरुष समानतेचं मूळ धरून मुलखीं कारभार सोपवणारा द्रष्टा सुधारक कधी सांगितलाच नाही आम्हाला....

वडिलांच्या स्वराज्यमंदिरावर स्वतःच्या प्राणांची आहुती देत कळस चढवणारा, "पुत्र व्हावा ऎसा गुंडा-ज्याचा तिन्ही लोकी झेंडा" ह्या तुकोबारायांच्या पंक्तीला पुरून उरलेला सज्ञान कर्ता पुत्र नाही सांगितला...

भक्ती आणि शक्तीचा सुंदर मिलाफ ठरलेली पंढरपूरची वारी आणि संत तुकाराम,संत ज्ञानेश्वर आदी विभूतींच्या पालख्या सुरु करून त्यांना सरकारातून खर्च आणि संरक्षण देणारा संस्कृती पुरस्कर्ता नाहीच दाखवला..

रामशेज सारखा सगळ्यात कमी उंचीचा पठारी किल्ला सतत सहा वर्षे कमी मनुष्यबळावर झुंझवता ठेवणारा झुंझार रणमर्द नाही दाखवला....

रयतेला छळणाऱ्या सिद्धीला समुद्रात बुडवायचा चंग बांधून ८०० मीटर लांबीचा समुद्रात भराव टाकून पूल बांधणारा इंजिनियर नाहीच सांगितला...

राजद्रोहासारखे गंभीर गुन्हे माफ करून वडिलधाऱ्यांचा मान आणि इज्जत अबाधित ठेवणारा एक मानी संस्कारी राजा नाही सांगितला कुणी...

बाणांच्या वर्षावात मनुष्यहानी होऊ नये म्हणून जनावरांच्या कातडीची जॅकेट तयार करून सैन्याची काळजी वाहणारा रणमर्द झुंजार नाही दाखवला....

मराठ्यांच्या स्वराज्याचा दुसरा छत्रपती, धाकलं धनी संभाजी महाराज....

ज्याचा जवळचा मित्र रायाप्पा एक "महार",

ज्याला सोडवायला तयार झालेला मियाखान एक "मुसलमान",
आपल्या धन्याच्या मरणाची वाट आपण शत्रूला दाखवली म्हणून १०-१२ वर्षांच्या वयात पश्चात्ताप करत शत्रुलाटेवर तुटून पडत त्यांच्या छावणीतले डेरेदांडे जाळत मृत्यू जवळ करणारी ती आठ पोरं "धनगर",

मलकापुरात दहा हजाराची राखीव आणि अजिंक्य फौज तयार करून देणारा, कवी आणि कवित्व जपतानाच राजधानी रायगडावर आलेलं शत्रू वावटळीची शेंडीला गाठ मारून धूळधाण उडवणारा... राजाचा श्वास जणू असा कविराज कलश एक "ब्राम्हण",

"#ब्राम्हण म्हणून कोण मुलाहिजा ठेवतो?? आणि #मराठा म्हणून कोण पाठी घालतो"?? अशी कणखर भूमिका ठेवणारा द्रष्टा व बहुजनवादी राजा म्हणजेच स्वराज्याचे दुसरे छत्रपती... धाकलं धनी.... महाराज... रणमर्द झुंजार... छावा....
सर्जा संभाजी छत्रपती ह्यांचा आज बलिदान दिन....

देश धरम पर मिटने वाला शेर शिवा का छावा था....
महापराक्रमी परमप्रतापी एकही शंभू राजा था....

"शंभूराज तुम्हाला ह्या मावळ्याचा त्रिवार मनाचा मुजरा."

#सकलकुलमंडीत_अखंड_लक्ष्मीअलंकृत_राजकार्य_धुरंधर_संस्कृत_पंडित_रणमर्द_छावा_छत्रपती_श्री_संभाजी_महाराज_कि_जय.
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