शनिवार, 5 जनवरी 2019

About K. R. Narayanan

             

             पूर्व राष्ट्रपति "के आर नारायणन"
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1948 में महामहिम नारायणन ने अंग्रेजी साहित्य में प्रथम श्रेणी से एमए पास किया।

एमए पास करने के बाद उन्होंने महाराजा कालेज में अंग्रेजी प्रवक्ता पद के लिये आवेदन किया।लेकिन त्रावणकोर के दीवान सीपी रामास्वामी अय्यर ने नारायणन को प्रवक्ता पद पर काम करने से रोक दिया और कहा क्लर्क पद कार्य करना होगा।

अय्यर के मन मे जातीय दम्भ इस क़दर भरा था कि एक दलित को  प्रवक्ता पद पर नही देख सकता था।

स्वाभिमानी नारायणन ने क्लर्क की नौकरी को लेने से साफ इंकार कर दिया,और इसके ठीक बाद विवि के दीक्षांत समारोह में बीए की डिग्री लेने से भी मना कर दिया।

इस घटना के 4 दशक बाद 1992 में उपराष्ट्रपति बनने पर उनके गृह राज्य केरल विवि के उसी सीनेट में उनका जोरदार स्वागत हुआ।

उस वक़्त तात्कालिक जातिवादियों पर तंज कसते हुए नारायणन ने कहा "आज मुझे उन जातिवादियों के दर्शन नही हो रहे जिन्होंने दलित होने के कारण इस विवि में मुझे प्रवक्ता बनने से बंचित कर दिया था"।

1946 में आर नारायणन दिल्ली में डॉ आंबेडकर से मिलने आये।डॉ आंबेडकर उस समय वायसराय की काउंसिल में श्रम विभाग के सदस्य थे,नारायणन की योग्यता को देखते हुए डॉ आंबेडकर ने उन्हें दिल्ली में ही भारत ओवरसीज विभाग जिसे अब "विदेश विभाग "कहा जाता है में 250 रुपये प्रतिमाह पर सरकारी नौकरी दिलवा दी।डॉ  अम्बेडकर के इस ऋण को लास्ट पाराग्राफ में देखे आर नारायणन ने कैसे चुकाया?

राजनियिक के तौर पर नारायणन  टोकियो, लंदन,ऑस्ट्रलिया, हनोई में स्थिति भारतीय उच्चायोग में प्रतिष्टित पदो पर रहे।1970 में चीन के राजदूत नियुक्त हुए।वहाँ से रिटायर होने के बाद  1979 से 1980 तक जेएनयू के कुलपति रहे।1980 से 1984 तक अमेरिका के राजदूत रहे।

14 जुलाई 1997 को भारत के दसवें राष्ट्रपति  चुने गए

आर नारायणन ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने दलितों के लिये उच्चतम न्यायालय में  न्यायाधीश बनने का रास्ता खोला।

उच्चतम न्यायालय के तत्कलीन मुख्य न्यायाधीश ए एस आनंद ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिये दस न्यायविद उच्च न्यायालयों के कानून विशेषज्ञों का एक पैनल बनाकर मंजूरी के लिये राष्ट्रपति को भेजा।

आर नारायणन ने उस फाइल को स्वीकृति करने  की बजाय तल्ख टिपण्णी लिखी-"क्या इन दस व्यक्तियों के पैनल में रखने के लिये उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों में अनु जाती जनजाति  का कोई योग्य न्यायाधीश नही है?"

देश के राष्ट्रपति की इस टिप्पणी से सरकार से लेकर न्यायालय में हड़कंप मच गया ।न्यायालयों में दलितों और आदिवासियों के प्रतिनिधित्त्व पर बहस शरू हो गई।

और एक राष्ट्रपति की इस टिप्पणी ने दलितों के लिये सर्वोच्च न्यायालय में प्रवेश का रास्ता खोला।
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