गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

तृष्णा

              दु:ख का मूल है तृष्णा
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*तृष्णा ही दुःख का कारण हैं।*
*तृष्णा का निरोध ही दुःख से मुक्ति है।*

भगवान बुद्ध ने अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में पांच भिक्खुओं को सम्बोधित करते हुए कहा :-

*"कतमञ्व भिक्खवे दुक्खसमुदयं अरियसच्चं ?*
*या यं तण्हा पोनोभविका नन्दिरागसहगता तत्र-तत्राभिनन्दिनी, सेय्याथीदं कामतण्हा, भवतण्हा, विभवतण्हा।"*

भिक्खुओं ! दुःख के समुदय के विषय में आर्य सत्य क्या है ?

*भिक्खुओं, यह जो बार बार जन्म का कारण है, यह जो लोभ तथा राग से युक्त है, यह जो जहाँ कहीं भी मजा लेती है, यह जो तृष्णा है, जैसे काम-तृष्णा, भव-तृष्णा तथा विभव-तृष्णा - यह तृष्णा ही दुःख के समुदय के बारे में आर्य सत्य है। यह तृष्णा ही दुःख का कारण है।*

*तृष्णा का अर्थ है इच्छा का पैदा होना, कामना की उत्पत्ति। एक इच्छा का पूरा होना अथवा कामना की पूर्ति हो पाना सम्भव नहीं है। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी इच्छा उठ खडी होती है, दूसरी पूरी होती है, तो तीसरी और फिर एक के बाद एक एक करके इच्छाओं की उत्पत्ति का क्रम चक्र चलने लगता है। संसार में कोई भी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता और दुःख को प्राप्त होता है।*

इसलिए तथागत गौतमबुद्ध ने तृष्णा के परित्याग को दुःख से मुक्ति कहा है।

*"यो तस्सायेव तण्हाय असेसविरागनिरोधो चागो पटिनिस्सग्गो मुत्ति अनालयो।"*

*उसी तृष्णा से सम्पूर्ण वैराग्य, उस तृष्णा का निरोध, त्याग, परित्याग, उस तृष्णा से मुक्ति, अनासक्ति - ही से दुःख से मुक्ति है।*

*एस धम्मो सनन्तनो -  यही सनातन सत्य है।*
                     🙏🙏🙏

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